Sirjan | रचना संसार
खूंटे में मोर दाल है, का खाउं-का पीउं, का ले के परदेस जाउं...
आप इस लोक कथा को एक बार फिर पढं़े, अपने बचपन के दिन याद करें और नयी पीढ़ी को भी इसके माध्यम से समझाने की कोशिश करंे कि कैसे बड़ी से बड़ी चुनौतियांे का सामना हिम्मत और अक्ल से किया जाए तो रास्ते निकल आते हैं. और एक खास बात यह कि सब उसी की मदद करते हैं, जो अपनी मदद करना स्वयं जानता है-
भोजपुरी लोकगीत में जीवन के मर्म
लोकगीत की व्यापकता मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक है। ये सबकी संपति मानी जाती है। आज का बच्चा कल बड़ा होने पर वह अपने बच्चों को यह सुनता है। मृत्यु जीवन का कटु सत्य है, जिसे भोजपुरी मानस (और भी क्षेत्रों में थोड़ा बदलाव के साथ गाया जाता है) में बच्चों को खेल-खेल मंे सिखाया जाता है।
एहो देखीं जा
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से
कुछ महेंद्र मिसिर के आउर कुछ ऐने ओने से जुगाड़ल गीत
लोक और शास्त्र दोनों मनुष्य है
‘‘ छन्नुलाल गाते कम, भाषण ज्यादा देते हैं’’
लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो...






