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Lokrang | रउवा ‘लोकरंग’ में बानीं

 

The folk tales of Bihar

Bihar, one of the most important states of India, has a rich tradition of folk culture. 'Panchtantra', the collection of famous Indian folk tales, has its origin in the telling of morality stories to the princes of 'Pataliputra' (Patna - the capital of Bihar). Apart from folk tales, Bihar is rich in numerous ballads and folk songs sung on different occasions either in order to increase the efficiency of human labour or for recreational purposes. Similarly, proverbs and riddles indicate a deep insight into worldly matters.

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लोक कलाओं का भविष्य

कलाओं के उद्भव और विकास का पहला चरण लोकभावना और सामुदायिक चेतना से अनुप्राणित रहा. कला के सृजन और उपभोग दोनों में सामुदायिक भावना स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ती थी. समूह मिल-जुलकर गाता और नाचता था. हजारों वर्षों तक सीमित संख्या के अभिप्रायों वाली लोककथाओं ने बच्चों की कई पीढ़ियों का मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन किया.

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लोक और शास्त्र दोनों मनुष्य है

भाषा और संस्कृति के सवालों पर विचार करते समय डॉ रामविलास शर्मा का विवेक लोक-चेतना से गहरे संयुक्त रहा है. प्रख्यात आलोचक और यशस्वी पत्रिका "सापेक्ष' के संपादक महावीर अग्रवाल ने शास्त्रीयता और तथाकथित शिष्ट संस्कृति के बरक्स लोकसंस्कृति, लोककला पर कुछ कहने का आग्रह जब रामविलास शर्मा से किया, तो रामविलास जी जैसे शीर्ष संस्कृति पुरुष के इस विषय पर कहे गये वचन दस्तावेजी बन गये. अब तक यह बातचीत अप्रकाशित-अप्रसारित थी. हमारे अनुरोध पर महावीर अग्रवाल ने यह दुर्लभ साक्षात्कार " गवेषणा' के पाठकों के लिए उपलब्ध कराया है. रामविलास जी को याद करते हुए और महावीर अग्रवाल के प्रति आभार प्रकट करते हुए यह साक्षात्कार प्रस्तुत है-

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इनमें से कौन सा खेल खेले हैं आप?

इन पंक्तियों को गाकर देखिए, याद आ जाएगा बचपन का दिन

- चल कबड्डी आसलाल, मर गया प्रकाशलाल
- आव तानी रे, डेरइहें मत रे
कपार कान फूटी- लड़िकपन छूटी- लड़िकपन छूटी...
- ओका-बोका तीन तड़ोका, लऊआ-लाठी चंदन काठी...

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मैं रहूंगी तो समाज का पानी भी बचाकर रखूंगी

मैं आपकी होली। पिछले कुछ वर्षों से मुझसे एक बड़ा वर्ग अलगाव-दुराव का भाव बरतने लगा है। वे कहते हैं कि मैं तो लुच्चे-लफंगों का त्यौहार हूं। मुझे उन्मादी बताते हैं। लेकिन मैं वैसी हूं नहीं। लोक को मस्ती में पिरोनेवाली हूं मैं। पर्व-त्यौहारों, धार्मिक उत्सवों-आयोजनों के बीच अपने तरह की संभवतः अकेली हूं मैं। धार्मिक पर्व-त्यौहार की शक्ल में रहते हुए भी उससे बहुत अलहदा हूं।

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कहां हैं जीवन और मस्ती के वे गीत

कृष्णदत्त पालीवाल
नयी पीढ़ी के लिए यह दिन काम की घनघोर व्यस्तताओं के बीच एक जरूरी छुट्टी की तरह है. इस बदलाव के कारणों को हमारी ओर्थक प्रगति के मॉडल में ढूंढ़ा जा सकता है. यूरोप में क्रिसमस मनाने के लिए देश रुक जाता है. लेकिन हम अपना पर्व मनाने के लिए तरसते रहते हैं.

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ओका-बोका तीन तडोका लउआ लाठी काठी

ये गीत अलग-अलग गीतकारों ने रचे हैं लेकिन इन्हें स्वर देकर मुकाम दिया भरत सिंह भारती ने. वही भरत सिंह भारती, जो आकाषवाणी के जरिये बिहारवासियों के दिलों में राज करते थे. अपने समूह के साथ खुद तबला बजाते हुए जब पुरबिया तान साधते थे तो हजारों की भींड़ घंटों बेसुध होकर जमी रहती थी. भरत सिंह भारती के गाये कुछ गीतों को पढ़िये

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एहो देखीं जा -

तोहरी बिहार, तोहे मुबारक, हमरी यूपी जिंदाबाद...!
राम ही केवल नाम पेयारा...
पागल था, चला गया, क्या फरक पड़ता है!
परंपरा तोड़नेवाला एक अद्भुत लौंडा, बेजोड़ कलाकार - चाईं ओझा
The folk tales of Bihar
मनराखन के बुद्ध
काल से इतर कालेश्वर
एक सत्याग्रही संन्यासी

बिदेसिया बिसेस: भिखारी ठाकुर

भोजपुरी सिनेमा के 50 बरिस

चिठी-पतरी, आख्यान-व्याख्यान

नदिया के पार के 25 वर्ष

दामुल के 25 साल

25 Yrs of Damul

एगो ऐतिहासिक क्षण

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