जड़ों से दूर जमीन की तलाश !

कबीर की एक पंक्ति है.
बोली हमरी पूरबी, हमको लखे न कोय
हमको तो सोइ लखे, जो पूरब का होय.
काफी वर्षों के बाद पूरब वालों ने यानी कि भोजपुरीभाषियों ने कबीर को लिखना शुरू किया. भोजपुरी का जब दायरा बढ़ा, देश-दुनिया में नया बाजार बना तो पिछले कुछ वर्षों से भोजपुरी दिवस मनाने की शुुरुआत हुई. कबीर के जन्म दिन को भोजपुरी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया. पिछले साल कई भोजपुरी संगठनों ने भोजपुरी दिवस मनाया लेकिन संगठनों में तिथि को लेकर आम सहमति नहीं बन सकी. सो किसी ने 17 जून तो कइयों ने 18-19 जून को भोजपुरी दिवस का आयोजन किया. कबीर याद किये गये. भोजपुरी को नयी बुलंदी पर पहुंचाने का संकल्प लिया गया. लेकिन कैसे, किन राहों को अपना कर, यह किसी ने स्पष्ट नहीं किया. यह कभी स्पष्ट होने की गुंजाइश भी नहीं बनती क्योंकि फिलहाल कई भोजपुरी संगठन और मंच विश्व व अखिल भारतीय स्तर का नाम जोड़कर संचालित हो रहे हैं लेकिन एक दूसरे के बीच फासले इतने हैं कि वे चाहे कुछ और कर ले, एकजुट होकर आंदोलन तो नहीं ही कर सकते. शायद इसी एकजुटता के अभाव में संसद में भोजपुरी को आठवीं अनुसूचि में शामिल करने क प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद भी यह मामला इतने दिनों से लटका हुआ है. खैर, राजनीति की बात बाद में क्योंकि अपने आप में यह एक बहुत बड़ा विषय है कि आखिर क्यों देश के पहले राष्ट्रपति से लेकर एक प्रधानमंत्री और कई राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को देनेवाला, 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाला भोजपुरीभाषी इलाका हमेशा बुनियादी सुविधाओं की ही बाट जोहते रह गया.
बात कर रहे थे भोजपुरी और उसी बहाने कबीर की. हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक व जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष डॉ. मैनेजर पांडेय ने काफी पहले ही यह स्थापित किया था अथवा करने का प्रयास किया था कि कबीर मूलतः भोजपुरी के ही कवि थे. यह भोजपुरी भाषियों के लिये गर्व की बात है लेकिन इस गर्व की अनुभूति बहुत कम भोजपुरी भाषियों ने की. भोजपुरी के नाम पर ही दुकानदारी चलानेवाले संगठनों ने भी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया. कबीर को किसी पहचान की जरूरत नहीं. कहने का मतलब यह भी नहीं कि भोजपुरीभाषी यदि कबीर को महत्व देने लगेंगे तो उनकी महत्ता और बढ़ जायेगी. लेकिन कई दुर्भाग्य इस पहलू से जुड़े हुए हैं. भोजपुरी का लोकसंगीत बाजार करोड़ों का है लेकिन कबीर के गीतों का  संग्रह ढूंढे तो भोजपुरी लोकगीत गायकों के एकाध एलबम संयोग से मिल सकते हैं. बावजूद इसके भोजपुरी दिवस मनाने के लइये एक हस्ती का नाम चाहिये था सो कबीर ही सही.


पहलका पेज । भिखारी ठाकुर ।  तमासा देखीं ।  भेंट-मुलाकात । इयाद में । सृजन-संसार।  इहो देखीं
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