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    अखिल भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, गोपालगंज में राहुल सांकृत्यायन का भाषण
    भाई बहिन लोगिन
    सरसुती माई के दरबार में जे अपने सब एतना मान हमरा के देहलीं ह ओकरा खातिर हम अपना के धन- धन समझतानी अबहीन हमनी के इ मतारी भाखा के केहू ना पूछत आछत बा लेकिन कतेक दिनवा हो, कतेक दिनवा. हमनी के देस के दिन लउटी आउर उहो दिनवा आई जब हमनी के भाखा सिरताज बनी. एक करोड से बेसी बीर बंका जेकर पूत, उ भखा केतना दिन ले भिखमंगीन बनल रही. हिनुई हमनी के बडकी माई ह आ ओकरा से नेह तूरे के काम नइखे. आज हिनुतान में लोग के राज भइल. हमनी के राजा रानी के राज ना चाहीं. इ लोग के राज तबे निमन चली जब लोग हुसियार होई. आ उ बूझे कि दुनिया जहान में का हो रहल बा. अपना देस में केहू बेपढल ना रहे. एकर कवन रहता बा.
    पिरितिया के अदभुत खेल
    स्कूली जीवन में जब अपनी कापी के पहले पन्ने में लव इज ब्लाइंड और लव इज गाॅड को पूरी कलाकारी से लिख कर ही प्रेम की सारी कलाबाजियां दिखाया करता था, तब एक मास्साब गुस्साकर कहा करते थे कि मडई दुबे बनेगा का रे! मैं नहीं जानता था कि मडई दुबे कौन हैं, न उस समय जानने की इच्छा थी. लगता था मास्साब गुस्साकर किसी गुंडे-मवाली से मेरी तुलना करते होंगे, इतनी हिम्मत भी नहीं थी कि उनसे पूछता कि किससे तुलना करते हैं मेरी ओर कौन हैं मडइ्र्र दुंबे जो ‘लव’ षब्द देखते ही आपको याद आने लगते हैं. एक बार उत्सुकता से पूछ ही लिया मास्साब से. जरा बताइये कि इ मडई दुबे कौन हैं? तब उन्होंने डांटते हुए इतना ही कहा था कि जो जानना और पढना है, वह तो कभी नहीं पूछते हो. सुनो-मडई दुबे पंडीजी थे आरा के. डोमिन से बियाह कर लिये थे.
  • डॉ राजेंद्र प्रसाद का पत्र पत्नी राजवंशी देवी के नाम

    निराला
    भारत के प्रथम राष्ट्र¬पति, संविधान सभा के अध्यक्ष और सादगी-ईमानदारी की प्रतिमूर्ति डॉ राजेंद्र प्रसाद उर्फ राजेन बाबू के कई पहलू से हम अनभिज्ञ हैं. राजेन बाबू के जीवन को जानना एक ऐसे व्यक्तित्व से रू-ब-रू होने जैसा है, जो सचमुच में देसी माटी का लाल रहा. आज हम रांची में रहनेवाली उनकी एक पौत्री मणि सिन्हा के सौजन्य से एक अति निजी पत्र प्रकाशित कर रहे हैं. राजेन बाबू ने यह पत्र अपनी पत्नी राजवंशी देवी को तब लिखा था, जब वे कलकते में रहते थे और वकालत के शानदार कैरियर को छोड़ कर राष्ट्र¬सेवा के लिए अपने को समर्पित करने जा रहे थे.
  • बंदिशों के बीच नयी लीक पर चलने का जज्बा

    आरा के एक गांव में रहने वाली पूनम सिंह जिस खामोशी से अपनी पांच बेटियों को कलाकार बनाकर, लोक नाट्य जगत में जो प्रयोग कर रही हैं, वह अद्भुत, प्रेरक है

    निराला
    विगत वर्ष जमशेदपुर के गोपाल मैदान में भोजपुरी लोकसंगीत का एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ था. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और अलग-अलग इलाके के करीब तीन-चार दर्जन नामी-गिरामी और कथित दिग्गज गायक कलाकारों का जमावड़ा लगा था. हजारों की संख्या में दर्शक-श्रोता भी पहुंचे थे. तभी एनाउंसमेंट हुआ कि चूंकि यह कार्यक्रम भिखारी ठाकुर को समर्पित है इसलिए इसकी शुरुआत उन्हीं के एक नाटक से होगी. आरा की पूनम सिंह व उनके साथी कलाकार प्रस्तुत करने जा रहे हैं प्रसिद्ध लोकनाटक - गबरघिंचोर. नाटक की घोषणा हुई. और उसके साथ ही कई दर्शकों-श्रोताओं की सिटीबाजी भी. हो हल्ला हुआ- छोड़िये नाटक-फाटक, जल्दी सुनवाइये झरेलिया वाला रंगफाड़ गाना...

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