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All about Bhikhari Thakur | भिखारी ठाकुर बिसेस

 

कहीं नामरद तो नहीं हो गये भिखारी!

"सुनीं जी'सीने पर गरम सांसें बिछल रही है, " लोग कहते हैं नचनिया धीरे-धीरे मेहरारू हो जाता है.'
"मैं बना क्या?'
"अभी नहीं, बाद में'
चुप हैं भिखारी
रात बीत रही है.
"मरद और मेहरारू में से एक ही तो रहोगे न'
"हां, बहुत कराहते हुये जवाब देते हैं भिखारी'
सुबह उठे तो कदम-कदम पर टोंकता रहा जैसे कोई," अकड़कर चलो, ऐ फिर ढीले हुये. हां, यह ठीक है. फिर..? एकदम सीधे ताकना मरद की तरह, हां'...

बेहूदगी का दौर और भिखारी की प्रासंगिकता


भिखारी सिर्फ भोजपुरी ही नहीं, भारतीय लोकसंस्कृति की एक विरासत हैं. उनकी सांस्कृतिक विरासत को सिर्फ बचाना ही नहीं उसे आगे बढ़ाना, अक्षुण्ण बनाये रखने की जिम्मेवारी सबसे पहले हर भोजपुरी कलाकारों की है. ऐसा मैं इसलिए नहीं कह रही क्योंकि मैं स्वयं भिखारी ठाकुर के इलाके छपरा से हूं बल्कि महानता को आदर-सम्मान और उनके प्रति अपने अपने दायित्वों का निर्वहन कर ही सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध किया जा सकता है.

अफसोस! वे सिर्फ इतना ही जानते हैं कि था कोई भिखारी लवंडा नाच करनेवाला

आखिर जो भिखारी मास के कलाकार थे, उन्हें क्लास में अथवा प्रेक्षागृह तक क्यों बांधकर रख दिया गया. इसके जवाब में संजय कहते हैं कि ऐसा नहीं है. जगदीशपुर और सोनपुर मेला तक में भिखारी के बिदेसिया का मंचन होता है और लोग सराहते हैं. भारत रंग महोत्सव से लेकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तक में बिदेसिया का शो देखने को लोग बेसब्री से इंतजार कर रहते हैं लेकिन अब मास में ले जाने में खतरे भी कम नहीं रह गये. मास मीडिया का एक माध्यम तो फिल्म भी है न. अब आज के भोजपुरी फिल्मों में क्या हो रहा है.

भिखारी, तमाशा, लौंडा नाच, राजनीति

भिखारी जैसे लोगों ने लौंडा नाच को परवान चढ़ाकर नाच वाली मनोरंजन की लोकप्रिय विधा पर खास वर्ग के प्रभुत्व को तोड़ दिया. मरद से मेहरारू का रूप धरे लौंडा को नचाना सबके बस में हो गया. लौंडा सबके यहां पहुंचने लगा. चैता से लेकर बियाह-शादी तक में. बाईजी की तरह ही मरद से मेहरारू बने लौंडा पर रूपइया लुटाने लगा एक तबका. खुलकर सिटी भी बजाने लगा, करीब से देखने, हाथों-गालों को छू लेने की हसरत पूरा करने लगा. लौंडा नाच ने बाईजी के नाच को जितनी चुनौती नहीं दी, उससे ज्यादा चुनौती उन्हें दी, जो मनोरंजन की इस विधा पर तवायफों के बाद बाईजी रूपी संस्करण पर भी बपौती रूप से अपना ही अधिकार जमाये बैठे थे.

'मैंने सिर्फ भिखारी का ऑटोग्राफ लिया'

अनेक व्यक्तियों को बड़े लोगों के हस्ताक्षर जमा करने का शौक बचपन से ही लग जाता है और कुछ तो नेताओं, अभिनेताओं, कवियों, खेल के विजेताओं इत्यादि को अपनी दस्तखत बही की पकड़ में लाकर ऐसे ही आहृलाद का अनुभव करते हैं जैसे बाज अपने शिकार को पंजे में पकड़ लेने पर. इसीलिये अंग्रेजी में इस शौक को 'ऑटोग्राफ हंटिंग' कहा जाता है. यह शौक मुझपर कभी हावी नहीं हो पाया. पर अब एक बार-केवल एक बार मैंने एक व्यक्ति से ऑटोग्राफ मांगा. वह व्यक्ति थे भिखारी ठाकुर.

मैं इस काम से अलग रहकर जीवित नहीं रह सकता - भिखारी ठाकुर

एक जनवरी 1965 के दिन के एक बजे लोक कलाकार भिखारी ठाकुर की 77वीं वर्षगांठ के शुभ अवसर पर धापा (कोलकाता के पूर्वी सीमांत) स्थित श्री सत्यनारायण भवन परिसर में भव्य अभिनंदन समारोह का आयोजन हुआ था। अभिनंदन के समापन समारोह के उपरांत संत जेवियर कालेज, रांची के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. रामसुहाग सिंह ने भिखारी ठाकुर का साक्षात्कार किया। प्रो. सिंह द्वारा किये गये इस साक्षात्कार को काफी वर्षों बाद रांची से प्रकाशित होने वाली अश्विनी कुमार पंकज की पत्रिका बिदेसिया में 1987 में प्रकाशित किया गया था.

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