Travel Tales | घुमते-फिरते
राम ही केवल नाम पेयारा...
बनारस. कई मायनों में देश ही नहीं दुनिया में अलग किस्म का २ाहर. आधुनिकता और परंपराओं के बीच घड़ी की पेंडुलम की तरह डोलता हुआ नगर. लेकिन कुछ खास ताकत भी. यहां परंपराओं पर अब भी नकली आधुनिकता पार नहीं पा रहा. यहां के रहनिहारों को मुग्ध रहने के साथ-साथ स्वआत्ममुग्ध रहने की भी आदत है. परंपरागत तौर पर. पीढि़यों से. बात-बेबात श्रेष्ठताबोध की झलक लोकमानस में दिखेगी. अतीत से तार जोड़ एक खास किस्म की अनुभूति से रोमांचित रहते हैं यहां के रहनिहार.
मनराखन के बुद्ध
नाम है मनराखन किस्कू. उम्र यही करीब 65 साल.मनराखन ना तो साहित्यकार हैं, न आधिकारिक रूप से अनुसंधानकर्ता और ना ही इतिहासकार. लेकिन जड़ों की तलाश करते-करते 15 वर्षों के अनवरत शोध से मनराखन ने जो तथ्य उभारे हैं, वह चौंकानेवाले हैं. मनराखन ने तर्कपूर्ण तथ्यों से यह साबित करने की कोशिश की है कि गौतम बुद्ध और आदिवासी समाज के बीच बहुत ही गहरा रिश्ता रहा है. और अगर मनराखन के तथ्यों को मानें तो आदिवासी समाज बुद्ध के सच्चे अनुयायी हैं.
काल से इतर कालेश्वर
लगभग तीन साल पहले की बात है. नाटे कद, सांवले रंग के एक अधेड़ को अपने अखबार के दफ्तर में सहयोगी मित्रों से बातचीत करते देखा. अस्त-व्यस्त कपड़े, टूटी हुई चप्पल, गले में गमछा, हाथ में झोला और माथे पर चपर-चपर तेल. सोचा, कोई होगा. दफ्तर में रोज ही तो नये चेहरों से सामना होता है. मेरे वरिष्ठ साथी ने परिचय कराया- ये कालेश्वर जी हैं. हजारीबाग के हेसालौंग गांव में रहते हैं. साहित्य सर्जना करते हैं. कहानीकार-कथाकार हैं.
विरानगी में बिदेसिया की मद्धम तान
हजारों की संख्या में दर्षक-श्रोता पहुंचे थे. तभी एनाउंसमेंट हुआ कि चूंकि यह कार्यक्रम भिखारी ठाकुर को समर्पित है इसलिए इसकी षुरुआत उन्हीं के एक नाटक से होगी. आरा की पूनम सिंह व उनके साथी कलाकार प्रस्तुत करने जा रहे हैं प्रसिद्ध लोकनाटक - गबरघिंचोर.
मैं नसीमा बिहार की नहीं, रेड लाइट एरिया की बेटी हूं
रात के बारह-एक बजे अचानक से दरवाजा खटखटाने की आवाज आती। अब्बा तीसी तेल लगे तीन तहों वाले दरवाजे के छेद से ताक-झांककर देखते? हड़बड़ाकर आते, तुरंत नींद से जगाकर मुझे बिठा देते। कंपकंपा देनेवाली ठंड में मैं अधनींदे बैठकर जोर-जोर से अली, बे, से… का रट लगाने लगती। फिर कभी ऐसा भी होता कि दरवाजे पर दस्तक पड़ी नहीं कि अम्मी, झट मुझे टांगकर छत पर ले जाती और हड्डी बेधनेवाली जानलेवा ठंड की रात में भी बाउंड्री वॉल पर बिठा देती ताकि जरूरत पड़े तो तुरंत मुझे धक्का देकर नीचे दूसरे छत पर धकेल दे। आपको मालूम, अब्बा-अम्मी यह दोनों तरीके किनसे बचने-बचाने के लिए अपनाते थे? पुलिसवालों से।
एन इनकाउंटर विद ए रिक्शावाला
मधेश्वर ने आगे जोड़ा, “आप बुरा नहीं मानिए, खाली आपको नहीं कह रहे हैं इन लड़के-लड़कियों को देखिए और सोचिए। इनकी जवानी को जंग लगा रहा है यह मोबाइल। एक सेकेंड सोचने का मौका नहीं देता। उलझाये रखता है आपस में। आसपास, समाज तक के बारे में सोचने तक का वक्त नहीं देता, जवानी की सारी ऊर्जा को सोख लेता है। इसलिए मैं कहता हूं कि यह मोबाइल जवानी को जंग लगा रहा है। नपुंसक बनाता है, सो अलग। वह तो आप भी कई बार पढ़े होंगे अखबार में।”
मोक्ष मांगती मोक्ष की नगरी
द्वंद्व के मुहाने से टकराते हुए दुनिया का प्राचीनतम शहर और भारतीय पुराणों के अनुसार तीर्थों के महाप्राण के रूप में स्थापित यह धार्मिक नगर वर्षों जड़ता के दौर से गुजरने के बाद अब धीरे-धीरे अवसान की ओर है!
एहो देखीं जा
The folk tales of Bihar
लोक कलाओं का भविष्य
लोक और शास्त्र दोनों मनुष्य है
इनमें से कौन सा खेल खेले हैं आप?
मैं रहूंगी तो समाज का पानी भी बचाकर रखूंगी






