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Tribute | इयाद में

 

पागल था, चला गया, क्या फरक पड़ता है!

पिछले दो दशक से महापात्रा बच्चों की पत्रिका निकालते थे. 100 भारतीय भाषाओं में. ओडि़या, बांग्ला, नागपुरी, भोजपुरी, अंगरेजी, हिंदी, संस्कृत, डोगरी आदि तमाम भाषाओं में. साइकिल पर घूम-घूमकर अपनी पत्रिका बेचते थे. महापात्रा किसी से मिलते तो अपने लिए कुछ नहीं मांगते थे. मन मिला तो विनम्रता से अपनी पत्रिका की ग्राहकी रसीद देते थे. एक साल के लिए 100 रुपये. साल में छह माह दूसरे प्रदेशों की यात्रा पर रहते थे. रचनाकारों से मिलकर उनकी रचनाएं लेने के लिए

गावेला बलेस्सर आजमगढ़ के, जे बाटे मुंहफूंकना रे सजनी

होश संभालने के बाद से ही जिस एक गायक को घरवालों से बच-बचाकर सुनने की मजबूरी रही थी, वह गायक बलेस्सर ही थे। बलेस्सर हमारे सभ्य भोजपुरी समाज के प्रतिबंधित गायक थे, जिन्हें सुनकर बच्चों के बिगड़ जाने की गुंजाइश रहती थी, परिवार और समाज का वातावरण बिगड़ जाने का भ्रम भी रहता था, इसलिए उन्हें सुनने नहीं दिया जाता था। मोटका मुंगड़वा का होई…, तीन बजे आके जगइहे पतरकी सुतल रहब खरिहानी में… जैसे गीतों को गाने के बाद अश्लीलता के पर्याय माने जाने लगे थे बलेस्सर। लेकिन अपनी पूरी जिंदगी में उन्होंने कभी इसकी परवाह नहीं की। वह अपने एक गीत का मुखड़ा हमेशा सुनाया करते थे बलेस्सर मुंहफूंकना रे सजनी…

लोकरस के धार की असल सूत्रधार थीं वह

18 फरवरी 2006 का वह दिन याद आता है. उस रोज दुपहरिया का समय था. पटना के कंकड़बाग मोहल्ले के वकील साहब की हवेली में उनसे मिलने पहुंचा था.तब उम्र के 86वें साल में बिहार की स्वर कोकिला विंध्यवासिनी कई बीमारियों की जकड़न में थी. न ठीक से बैठने की स्थिति थी, न बोलने-बतियाने की ताकत. लेकिन बच्चों जैसी उमंग, उत्साह लिये सामने आयीं.

इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन डीयर...?

तब कुलदीप हंसते हुए कहते, मरूंगा तो जरा गाजे-बाजे के साथ कलाकारी वाले अंदाज में ले जाना, जलाना मुझे... बिनू ने किया भी वैसा ही. बाजे के साथ उनकी अर्थी उठी और घाट तकजाने वाले थे कुल जमा दस लोग...यह भी अजब संयोग था कि मंजरवे की मौत की खबर सुन कर उस सवाल का जवाब भी मिल गया, जो मैंने अपने दोस्त से मैसेज के माध्यम से पूछा था-आई वांट टू लीव फुल्ली, सो आई कैन डाई हैप्पी... इज इट पॉसिबल फॉर एनी वन...?

मैं अपना दुख नहीं बेचता, फिर भी लोग भुना लेते हैं

वहां भोजपुरी फिल्‍मी कलाकारों के लटके-झटके में गोविंद दा कहां गुम हो गये थे, पता ही नहीं चला। वे बैठे रहे, एक कतार में। मूक दर्शक बन कर। सिनेमा में गांव, गांव का सोन्हापन, बोली, आंचलिकता और भोजपुरी परिवेश को एक अलग मुकाम पर ले जाने वाले गोविंद दा को उस फिल्‍म फेस्टिवल में उपेक्षित देख मन विचलित हुआ। अगले दिन बनारस के होटल में मिले तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि अरे! पागल हो क्‍या? यही रवायत है फिल्‍मी दुनिया का। इसे समझ लोगे तो मन को कोई परेशानी नहीं होगी। मैं ठीक हूं, मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगता अब।

एहो देखीं जा

 

परंपरा तोड़नेवाला एक अद्भुत लौंडा, बेजोड़ कलाकार - चाईं ओझा
एक सत्याग्रही संन्यासी
नौटंकी की पहली महिला

लोक और शास्त्र दोनों मनुष्य है
‘‘ छन्नुलाल गाते कम, भाषण ज्यादा देते हैं’’
लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो...

 

बिसेस: भिखारी ठाकुर के

भोजपुरी सिनेमा के 50 बरिस

चिठी-पतरी, आख्यान-व्याख्यान

नदिया के पार के 25 वर्ष

दामुल के 25 साल

25 Yrs of Damul

एगो ऐतिहासिक क्षण

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