Interviews | भेंट-मुलाकात
लोक और शास्त्र दोनों मनुष्य है
भाषा और संस्कृति के सवालों पर विचार करते समय डॉ रामविलास शर्मा का विवेक लोक-चेतना से गहरे संयुक्त रहा है. प्रख्यात आलोचक और यशस्वी पत्रिका "सापेक्ष' के संपादक महावीर अग्रवाल ने शास्त्रीयता और तथाकथित शिष्ट संस्कृति के बरक्स लोकसंस्कृति, लोककला पर कुछ कहने का आग्रह जब रामविलास शर्मा से किया, तो रामविलास जी जैसे शीर्ष संस्कृति पुरुष के इस विषय पर कहे गये वचन दस्तावेजी बन गये. अब तक यह बातचीत अप्रकाशित-अप्रसारित थी. हमारे अनुरोध पर महावीर अग्रवाल ने यह दुर्लभ साक्षात्कार " गवेषणा' के पाठकों के लिए उपलब्ध कराया है. रामविलास जी को याद करते हुए और महावीर अग्रवाल के प्रति आभार प्रकट करते हुए यह साक्षात्कार प्रस्तुत है-
‘‘ छन्नुलाल गाते कम, भाषण ज्यादा देते हैं’’
लोक संगीत तो मूल है ही. उसी से तो सारे शास्त्रीय राग निकले हैं. लोक और शास्त्रीयता का घालमेल को सुनने के लिए बिस्मिल्ला खान साहब को कभी सुनिए, दोनों पर उनकी कैसी जबर्दस्त पकड़ थी. छन्नुलालजी तो मंच पर गाते कम और बातें ज़्यादा बनाते हैं. बात का बतंगड़ बनाते रहते हैं. कोई गवैया गाकर अपनी बात कहेगा कि भाषण देता रहेगा. छन्नुलालजी आजकल वही ज्यादा करते हैं. गिरिजा देवी की बात आप कर रहे हैं. वह ठुमरी गाती हैं, चैती-कजरी अच्छा गाती हैं लेकिन जब खयाल गाने की कोशिश करने लगती हैं, तो सब कबाड़ा हो जाता है. जो गा सकती हैं, वही गाने की कोशिश करें तो बेहतर.
लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो...
न कोई बड़ी-बड़ी बातें, न श्रेष्ठताबोध से ग्रसित वाक्य. गीत-संगीत की भाषा में ही सबकुछ बताना चाहती हैं शारदा. किसी गीत के बारे में जानने के लिए सवाल कीजिए तो वह गाकर सुनाएंगीं. माथे पर बड़ी लाल बिंदी, होठों पर गहरी लाल रंग की लिपस्टिक और मुंह में पान, इसी रंग में रहती हैं शारदा. चाहे घर पर हों या देश-परदेश के किसी कोने में. लोकमानस में रची-बसी शारदा सिन्हा से काफी समय बाद पिछले दिनों लंबी बात-मुलाकात हुई. पेश है चुनिंदा अंश ं-
एहो देखीं जा
परंपरा तोड़नेवाला एक अद्भुत लौंडा, बेजोड़ कलाकार - चाईं ओझा
एक सत्याग्रही संन्यासी
नौटंकी की पहली महिला
खूंटे में मोर दाल है, का खाउं-का पीउं, का ले के परदेस जाउं...
भोजपुरी लोकगीत में जीवन के मर्म






