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Anam-Badnam | अनाम, गुमनाम, बदनाम

 

पागल था, चला गया, क्या फरक पड़ता है!

पिछले दो दशक से महापात्रा बच्चों की पत्रिका निकालते थे. 100 भारतीय भाषाओं में. ओडि़या, बांग्ला, नागपुरी, भोजपुरी, अंगरेजी, हिंदी, संस्कृत, डोगरी आदि तमाम भाषाओं में. साइकिल पर घूम-घूमकर अपनी पत्रिका बेचते थे. महापात्रा किसी से मिलते तो अपने लिए कुछ नहीं मांगते थे. मन मिला तो विनम्रता से अपनी पत्रिका की ग्राहकी रसीद देते थे. एक साल के लिए 100 रुपये. साल में छह माह दूसरे प्रदेशों की यात्रा पर रहते थे. रचनाकारों से मिलकर उनकी रचनाएं लेने के लिए

मनराखन के बुद्ध

नाम है मनराखन किस्कू. उम्र यही करीब 65 साल.मनराखन ना तो साहित्यकार हैं, न आधिकारिक रूप से अनुसंधानकर्ता और ना ही इतिहासकार. लेकिन जड़ों की तलाश करते-करते 15 वर्षों के अनवरत शोध से मनराखन ने जो तथ्य उभारे हैं, वह चौंकानेवाले हैं. मनराखन ने तर्कपूर्ण तथ्यों से यह साबित करने की कोशिश की है कि गौतम बुद्ध और आदिवासी समाज के बीच बहुत ही गहरा रिश्ता रहा है. और अगर मनराखन के तथ्यों को मानें तो आदिवासी समाज बुद्ध के सच्चे अनुयायी हैं.

काल से इतर कालेश्वर

लगभग तीन साल पहले की बात है. नाटे कद, सांवले रंग के एक अधेड़ को अपने अखबार के दफ्तर में सहयोगी मित्रों से बातचीत करते देखा. अस्त-व्यस्त कपड़े, टूटी हुई चप्पल, गले में गमछा, हाथ में झोला और माथे पर चपर-चपर तेल. सोचा, कोई होगा. दफ्तर में रोज ही तो नये चेहरों से सामना होता है. मेरे वरिष्ठ साथी ने परिचय कराया- ये कालेश्वर जी हैं. हजारीबाग के हेसालौंग गांव में रहते हैं. साहित्य सर्जना करते हैं. कहानीकार-कथाकार हैं.

एक सत्याग्रही संन्यासी

भोजपुरी क्षेत्र के शाहाबाद इलाके में सासाराम के निकट गांव के एक संन्यासी के बारे में कुछ जानकारी हम दे रहे हैं. इस अफसोस के साथ कि नित्य नये नायकों की तलाश में लगा भोजपुरी समाज अपने इस कीमती नायक को याद भी नहीं करता. उस नायक को, जिसने अपना पूरा जीवन ही राष्ट्र के लिए खपा दिया. जिसे महात्मा गांधी से लेकर डाॅ राजेंद्र प्रसाद और उस युग के तमाम नेताओं का सान्निध्य प्राप्त हुआ. जिसके व्यक्तित्व और कृतित्व क्षमता से अंगरेजों को भी परेशानी होती थी. उस संन्यासी को जानना काफी दिलचस्प है, जिसके नाम पर देश दुनिया में तो तरह-तरह के संस्थान वगैरह चल रहे हैं,जिसके नाम को इंटरनेट की दुनिया में खोजने पर हजारों रिजल्ट आते हैं लेकिन बिहार में उनका कोई नामलेवा नहीं. यहां बिदेसिया की ओर से प्रस्तुत है भवानी दयाल संन्यासी के बारे में संक्षिप्त जानकारी और उनका खुद का लिखा हुआ कुछ अंश-

विरानगी में बिदेसिया की मद्धम तान

हजारों की संख्या में दर्षक-श्रोता पहुंचे थे. तभी एनाउंसमेंट हुआ कि चूंकि यह कार्यक्रम भिखारी ठाकुर को समर्पित है इसलिए इसकी षुरुआत उन्हीं के एक नाटक से होगी. आरा की पूनम सिंह व उनके साथी कलाकार प्रस्तुत करने जा रहे हैं प्रसिद्ध लोकनाटक - गबरघिंचोर.

दिल दिया, जान दी और दे दी सारी कमाई...

अकथ कहानी प्रेम की
काल निगल गया एक प्रेम कथा को
इतिहास में गुमनाम ही हैं बाबू कुंवर सिंह की सहयोगी और बाद में दूसरी पत्नी बनीं धरमन

बत्तख मियां न होते तो 1917 में ही दुनिया से विदा हो जाते बापू

30 जनवरी को हम शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं. उसी रोज नथुराम गोड्से ने गांधी की हत्या कर दी थी. लेकिन गांधी की हत्या उनके शुरुआती दिनों में ही हो जाती, यदि बत्तख मियां न होते. आइये कुछ जानते हैं अपने माटी के गुमनाम नायक बत्तख मियां अंसारी की दास्तां-

गावेला बलेस्सर अजमगढ़ के, जे बाटे मुंहफूंकना रे सजनी....

मैं आजमगढ़ का रहनेवाला सामान्य सा एक बिरहा गायक हूं. अपनी गायकी को लेकर कभी द्वंद्व में नहीं रहता, ना रहना चाहता हूं कि नवरात्रा आये तो जरा माई का भजन गाकर भी खुद को लोकप्रिय कर लूं, सावन का महीना आये तो जरा बम भोले के गीतों पर भी सुर लगा लूं और जब होली आये तो साया-चोली का बाजूबंद खोलने में लग जाउं. मैं वही गाता हूं, जो सच है. सच यही है कि लोक का मिजाज यथार्थ में जीता है, वह अपने जीवन की सच्चाई को, जीवन की मस्ती को, जीवन की आकांक्षा को लोकगीतों में तलाशता है.

एहो देखीं जा

 

लोक और शास्त्र दोनों मनुष्य है
‘‘ छन्नुलाल गाते कम, भाषण ज्यादा देते हैं’’
लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो...

खूंटे में मोर दाल है, का खाउं-का पीउं, का ले के परदेस जाउं...
भोजपुरी लोकगीत में जीवन के मर्म

 

बिसेस: भिखारी ठाकुर के

भोजपुरी सिनेमा के 50 बरिस

चिठी-पतरी, आख्यान-व्याख्यान

नदिया के पार के 25 वर्ष

दामुल के 25 साल

25 Yrs of Damul

एगो ऐतिहासिक क्षण

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