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पढ़ीं जा होली के एकदमे छंटलका गीत ...

चढ़त चैत चित लागे न रामा..

चंचल


फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ ऋतुराज वसंत विदा हो जाते हैं. महीने भर उड़ा रंगों का गुबार थम जाता है. रंग बाज दफे प्रफुल्लित हो जाया करते हैं. इसमें से कविता, कहानी या यादें उगती हैं. ‘लोक’ इन्हें संजो कर रखता है. संगीत, नृत्य, कला में, रंग मंच पर ये बेबाक हस्ताक्षर बनते हैं. ओ सुनो सामुझ निगरुनिया गा रहा है- कोठवा पे ढुंढ़लीं, अटरिया पे ढूंढ़लीं, सेजिया पे ढूंढ़तै लजा गेली रामा.. मद्दू पत्रकार लोक पर थे, कि अचानक लाल्साहेब ने रोक लगा दी- का बात है गुरु! आज अल्सुबहै लगे लसियाने? मद्दू ने पाला बदला-लोक गायब हो रहा है.

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गावेले दास गायत्री, खींच के तीन गो चिचरी...


जिंदगी भर भोजपुरी को जगाते रहे, गायकी की दुनिया में उर्जा भरते रहे, खुद खामोशी के साथ चले गये भोजपुरी सम्राट गायत्री ठाकुर

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लौंडा बदनाम हुआ...

निराला

लौंडा को बदनाम करने-करवाने वाला गीत ‘ लौंडा बदनाम हुआ, नसीबन तेरे लिए...’ किसने रचा था, इसका पता लगाया जाना अब भी बाकी है लेकिन लगभग अब यह हर कोई जानता है कि इसे गा-गाकर लोगों के बीच मशहूर करने और लोकमानस में रचा-बसा देने का पहला श्रेय ताराबानो फैजाबादी के नाम है. करीब तीन-चार दशक पहले दिलकश अदा के साथ बहुत ही खूबसूरती से लौंडों को बदनाम करवायी थीं ताराबानो. उसके बाद से तो लौंडे को बदनाम करने-करवानेवालों की फौज ही खड़ी हो गयी और फिर तो लौंडे बदनामी का ही पर्याय बन गये.

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भोजपुरी धरती और लोकराग- कृष्ण बिहारी मिश्र का व्याख्यान

अपनी बोली-बानी, धरती-धाम, घर-आंगन, राह-घाट, खेत-खलिहान से मिलना-जुलना, बोलना-बतियाना हर आदमी को अंतरंग सुख देता है. अपनी शोभा-शक्ति की चर्चा करना और सुनना अत्यंत प्रीतिकर होता है. मेरी मातृबोली में दीर्घकाल से गूंजने वाले लोकगीतों की वैशिष्ट्य-चर्चा का अवसर देकर मेरी ग्रामीण संवेदना को उल्लास-मुखर होने का उपयुक्त आधार आपने दिया है. आपके विवेक और सहृदयता के लिये मैं आपका आभारी हूं. अपनी बोली और अपनी मां किसे अच्छी नहीं लगती और जाति अपमान किसे कष्ट नहीं देता. जाति से मेरा अभिप्राय उस बहुआयामी आधार से है जो हमारे व्यक्तित्व को रूपायित करता है, स्वकीय वैशिष्ट्य से युक्त करता है. भोजपुरी धरती, हवा-पानी ने मुझे चलना-बोलना सिखाया है, अंखफोर बनाया है, लोक चक्षु से चक्षु मिलाने की संवेदना और शक्ति दी है. इसलिये इसे जब कोई अन्यथा दृष्टि से निहारता है तो अनायास मेरा स्वाभिमान उत्तेजित हो जाता है.

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भंवरजाल में भोजपुरी!

आज सुबह-सुबह अखबार में एक छोटी-सी खबर पर नजर गयी.लोकगायिका मालिनी अवस्थी को भोजपुरी अकादमी, बिहार ने ब्रांड अंबेसडर बनाया है. अगले तीन सालों तक वे अकादमी का ब्रांड अंबेसडर रहेंगी. भोजपुरी का प्रचार प्रसार करेंगी. नहीं मालूम ब्रांड अंबेसडर चयन की क्या प्रक्रिया है, क्या मानदंड हैं. और न तो मालिनीजी से, न ही अकादमी के किसी पदाधिकारी से, किसी से व्यक्तिगत तौर पर कोई राग-द्वेष नहीं. मालिनीजी से अब तक कभी मिला नहीं हूं, अकादमी का दफ्तर कहां है, पदाधिकारियों का आवास कहां है, यह जानने की जरूरत कभी नहीं पड़ी. बतौर गायिका, मालिनी जी का सम्मान करता हूं. उनकी खास शैली और गायन में जो मुरकी होती है, उस वजह से उनका एक बड़ा प्रशंसक हूं लेकिन सच कहूं तो अकादमी का निर्णय बार-बार अखरन का भाव पैदा कर रहा है.

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खतरे में है भोजपुरी सिने जगत का अस्तित्व


२० करोड़ की आबादी वाले भोजपुरी भाषी दर्शकों का प्रतिनिधत्व भोजपुरी इंडस्ट्री करती है. कुछ एक साल पहले इस इंडस्ट्री ने अपने ५० साल पूरे किए हैं, लगभग २०० करोड़ की इस इंडस्ट्री में हर साल ५० से ५५ फिल्में रिलीज होती है. कागजी आंकडो पर नजर डाले तो हर फिल्म सुपरहिट है,हर कलाकार सुपरस्टार है लेकिन हकीकत इससे कोसो दूर हैं

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धर्म की अनुपम अवधारणा


उनका नाम अनुपम मिश्र है. देसज तरीके से सोचने, लिखने, बोलनेवाले और उसी तरह से पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करनेवाले कार्यकर्ता. वर्षों बाद उनसे मुलाकात हुई. पटना में. उससे पहले एक दफा की ही मुलाकात थी. रांची में. वे एक आयोजन में आये थे, प्रभात खबर के लिए साक्षात्कार करने गया था. फिर छह-सालों के बीच में मुलाकात तो नहीं हुई लेकिन बातचीत होती रही. पिछले दिनों पटना आये तो उनसे आग्रह किया कि साथियों के साथ बतकही की एक चौपाल लगायेंगे, आयेंगे क्या? वे शाम छह बजे एयरपोर्ट उतरे और साढ़े छह बजे चौपाल में. उमस भरी गर्मी के बीच चौपाल शुरू हुई. बिजली आती-जाती रही, अनुपम जी अपने लय में बोलते रहे. सिर्फ बीच में रूककर बोले कि कैंडल है तो जला लो, चलेगा. कैंडल नहीं था, मोबाइल के टॉर्च में ही चौपाल चलती रही. उस चौपाल में और उसके बाद उनसे बहुतेरे विषयों पर बतकही हुई. जो याद है, उसे साझा कर रहा हूं. शब्दों का हेरफेर है, बतकही का भाव कुछ ऐसा ही था.

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अजी लाज लागेला जी! का सोचिहें लालू, का कहिहें नीतीश...

रमअंगेया चलते-चलते कहे- ‘‘बाकिर हमरा बारे में ना कहब नीतीश बाबू से कुछो. रावा अपना ओर से पैरबी लगाईब कि हो जाओ मल्लिकजी के एगो परोगराम आउर भेंटा जास मंच पर तो देख लीं उनुका के एक बेर, मिल लीं उनुको से एक बेर....’’

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बिदेसिया के निहोरा बा

Bhojpuri Cinema

 

बिदेसिया राउर आपन मंच बा. एगो साझा प्रयास बा. मकसद बा लोकरंग, लोकजीवन से जुड़ल लोक इतिहास सामने आवे. जे समृद्ध परंपरा रहल बा, ओकर दस्तावेजीकरन होखे. आप सबसे आग्रह बा, अधिक से अधिक सामग्री जुटा के बिदेसिया के समृद्ध करींजा.
संपर्क करीं जा : niralabidesia@gmail.com

 

बिदेसिया बिसेस: भिखारी ठाकुर

भोजपुरी सिनेमा के 50 बरिस

चिठी-पतरी, आख्यान-व्याख्यान

नदिया के पार के 25 वर्ष

दामुल के 25 साल

25 Yrs of Damul

एगो ऐतिहासिक क्षण

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