
पढ़ीं जा होली के एकदमे छंटलका गीत ...
तोहरी बिहार, तोहे मुबारक, हमरी यूपी जिंदाबाद...!
एक गप्पबाज ने, एक समय में वर्तमान काल के हिसाब से गढ़े गये प्रसिद्ध जुमले का भविष्यकाल मंे रूपांतरण किया. इंदिरा गांधी जब 1980 में जोरदार वापसी की थी तो गैर कांग्रेसियों को राह चलते चिढ़ाने के लिए एक जुमला काफी मशहूर हुआ था-
कह फलाने अब का होई. छूटल घाट धोबिनिया पवलस, अब तो पटक-पटक के धोई...
इस बार मायावती अगर दुबारा सत्ता में आ जाएंगी तो उसके परिप्रेक्ष्य में इसका रूपांतरण करते हुए एक सपाई छुटभैये को एक कांग्रेसी ने सुनाया-
का गुरू, इ सच्चो होई! का फिर से घाट बहिनिये पायी!! भइया, तब तो रगड़-घसड़ के धोई...!
राम ही केवल नाम पेयारा...
बनारस. कई मायनों में देश ही नहीं दुनिया में अलग किस्म का २ाहर. आधुनिकता और परंपराओं के बीच घड़ी की पेंडुलम की तरह डोलता हुआ नगर. लेकिन कुछ खास ताकत भी. यहां परंपराओं पर अब भी नकली आधुनिकता पार नहीं पा रहा. यहां के रहनिहारों को मुग्ध रहने के साथ-साथ स्वआत्ममुग्ध रहने की भी आदत है. परंपरागत तौर पर. पीढि़यों से. बात-बेबात श्रेष्ठताबोध की झलक लोकमानस में दिखेगी. अतीत से तार जोड़ एक खास किस्म की अनुभूति से रोमांचित रहते हैं यहां के रहनिहार.
पागल था, चला गया, क्या फरक पड़ता है!
पिछले दो दशक से महापात्रा बच्चों की पत्रिका निकालते थे. 100 भारतीय भाषाओं में. ओडि़या, बांग्ला, नागपुरी, भोजपुरी, अंगरेजी, हिंदी, संस्कृत, डोगरी आदि तमाम भाषाओं में. साइकिल पर घूम-घूमकर अपनी पत्रिका बेचते थे. महापात्रा किसी से मिलते तो अपने लिए कुछ नहीं मांगते थे. मन मिला तो विनम्रता से अपनी पत्रिका की ग्राहकी रसीद देते थे. एक साल के लिए 100 रुपये. साल में छह माह दूसरे प्रदेशों की यात्रा पर रहते थे. रचनाकारों से मिलकर उनकी रचनाएं लेने के लिए
कहीं नामरद तो नहीं हो गये भिखारी!
"सुनीं जी'सीने पर गरम सांसें बिछल रही है, " लोग कहते हैं नचनिया धीरे-धीरे मेहरारू हो जाता है.'
"मैं बना क्या?'
"अभी नहीं, बाद में'
चुप हैं भिखारी
रात बीत रही है.
"मरद और मेहरारू में से एक ही तो रहोगे न'
"हां, बहुत कराहते हुये जवाब देते हैं भिखारी'
सुबह उठे तो कदम-कदम पर टोंकता रहा जैसे कोई," अकड़कर चलो, ऐ फिर ढीले हुये. हां, यह ठीक है. फिर..? एकदम सीधे ताकना मरद की तरह, हां'...
भिखारी, तमाशा, लौंडा नाच, राजनीति
भिखारी जैसे लोगों ने लौंडा नाच को परवान चढ़ाकर नाच वाली मनोरंजन की लोकप्रिय विधा पर खास वर्ग के प्रभुत्व को तोड़ दिया. मरद से मेहरारू का रूप धरे लौंडा को नचाना सबके बस में हो गया. लौंडा सबके यहां पहुंचने लगा. चैता से लेकर बियाह-शादी तक में. बाईजी की तरह ही मरद से मेहरारू बने लौंडा पर रूपइया लुटाने लगा एक तबका. खुलकर सिटी भी बजाने लगा, करीब से देखने, हाथों-गालों को छू लेने की हसरत पूरा करने लगा. लौंडा नाच ने बाईजी के नाच को जितनी चुनौती नहीं दी, उससे ज्यादा चुनौती उन्हें दी, जो मनोरंजन की इस विधा पर तवायफों के बाद बाईजी रूपी संस्करण पर भी बपौती रूप से अपना ही अधिकार जमाये बैठे थे.
मैं इस काम से अलग रहकर जीवित नहीं रह सकता - भिखारी ठाकुर
लोकरंग की दुनिया में इसे एक दुर्लभ साक्षात्कार भी कह सकते हैं। इस साक्षात्कार को पढ़ने के बाद भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व के बारे में कई बातें स्वत: ही सामने आ जायेंगी। कैसे बुलंदियों के दिन में भी भिखारी अपने बारे में कुछ बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताना चाहते थे. भिखारी को शायद तब ही इस बात का अहसास था कि आनेवाले दिनों में तमाशाई संस्कृति लोकरंग को निगल लेगी, तभी तो एक सवाल के जवाब में वे कहते हैं कि अगले जनम में वे यही करना चाहेंगे, अभी से नहीं कह सकते। भिखारी अपने निजी व सार्वजनिक जीवन में कोई रहस्य का पर्दा नहीं डालना चाहते थे, इसीलिये जब उनसे नाच का उद्देश्य पूछा गया तो उन्होंने धनार्जन को भी स्वीकारा।
'मैंने सिर्फ भिखारी का ऑटोग्राफ लिया'
अनेक व्यक्तियों को बड़े लोगों के हस्ताक्षर जमा करने का शौक बचपन से ही लग जाता है और कुछ तो नेताओं, अभिनेताओं, कवियों, खेल के विजेताओं इत्यादि को अपनी दस्तखत बही की पकड़ में लाकर ऐसे ही आहृलाद का अनुभव करते हैं जैसे बाज अपने शिकार को पंजे में पकड़ लेने पर. इसीलिये अंग्रेजी में इस शौक को 'ऑटोग्राफ हंटिंग' कहा जाता है. यह शौक मुझपर कभी हावी नहीं हो पाया. पर अब एक बार-केवल एक बार मैंने एक व्यक्ति से ऑटोग्राफ मांगा. वह व्यक्ति थे भिखारी ठाकुर.
भोजपुरी सिनेमा: भंवरजाल के 50 साल
16 फरवरी 2011 को भोजपुरी सिनेमा 50वें साल में प्रवेश कर गया है. कई उतार-चढ़ाव और कुछ स्वर्णीम अनुभवों के दौर से गुजरने के बाद बाजार में एक बड़ी ताकत के तौर पर उभरा यह इंडस्ट्री द्वंद्व और दुविधा में अब भी फंसा हुआ है. भोजपुरी फिल्मों के 50 वर्षों की यात्रा के बाद मिले मुकाम की पड़़ताल -
बिदेसिया के निहोरा बा

बिदेसिया राउर आपन मंच बा. एगो साझा प्रयास बा. मकसद बा लोकरंग, लोकजीवन से जुड़ल लोक इतिहास सामने आवे. जे समृद्ध परंपरा रहल बा, ओकर दस्तावेजीकरन होखे. आप सबसे आग्रह बा, अधिक से अधिक सामग्री जुटा के बिदेसिया के समृद्ध करींजा.
संपर्क करीं जा : niralabidesia@gmail.com




