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भोजपुरी सिनेमा: भंवरजाल के 50 साल

film16 फरवरी 2011 को भोजपुरी सिनेमा 50वें साल में प्रवेश कर गया है. कई उतार-चढ़ाव और कुछ स्वर्णीम अनुभवों के दौर से गुजरने के बाद बाजार में एक बड़ी ताकत के तौर पर उभरा यह इंडस्ट्री द्वंद्व और दुविधा में अब भी फंसा हुआ है. भोजपुरी फिल्मों के 50 वर्षों की यात्रा के बाद मिले मुकाम की पड़़ताल -

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‘‘वे खुद को खेवनहार बताते हैं, मुझे बहुत तरस आता है उनपर’’

क्या कहूं, सब तो अपने छोटे भाई की तरह ही हैं लेकिन कभी-कभी हंसी भी आती है आज के कलाकारों, निर्माताओं-निर्देशकों पर, जो यह भ्रम पाले बैठे हैं या मीडिया में बयान भी देते हैं कि उनकी बदौलत ही भोजपुरी सिनेमा इस उंचाई तक पहुंचा है. यह अज्ञानतावश कहते होंगे तो इतिहास की जानकारी लेनी चाहिए. मुझे इनलोगों की समझदारी पर तब भी तरस आती है, जब वे बिहार में जाकर मीडिया बार-बार यह बयान देते रहते हैं कि यहां भोजपुरी फिल्म स्टूडियो का निर्माण होना चाहिए!

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दिल दिया, जान दी और दे दी सारी कमाई...

अकथ कहानी प्रेम की
काल निगल गया एक प्रेम कथा को
इतिहास में गुमनाम ही हैं बाबू कुंवर सिंह की सहयोगी और बाद में दूसरी पत्नी बनीं धरमन

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लोग मुझसे उम्मीद करते हैं, मैं भी बहक गयी तो...

न कोई बड़ी-बड़ी बातें, न श्रेष्ठताबोध से ग्रसित वाक्य. गीत-संगीत की भाषा में ही सबकुछ बताना चाहती हैं शारदा. किसी गीत के बारे में जानने के लिए सवाल कीजिए तो वह गाकर सुनाएंगीं. माथे पर बड़ी लाल बिंदी, होठों पर गहरी लाल रंग की लिपस्टिक और मुंह में पान, इसी रंग में रहती हैं शारदा. चाहे घर पर हों या देश-परदेश के किसी कोने में. लोकमानस में रची-बसी शारदा सिन्हा से काफी समय बाद पिछले दिनों लंबी बात-मुलाकात हुई. पेश है चुनिंदा अंश ं-

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बत्तख मियां न होते तो 1917 में ही दुनिया से विदा हो जाते बापू

30 जनवरी को हम शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं. उसी रोज नथुराम गोड्से ने गांधी की हत्या कर दी थी. लेकिन गांधी की हत्या उनके शुरुआती दिनों में ही हो जाती, यदि बत्तख मियां न होते. आइये कुछ जानते हैं अपने माटी के गुमनाम नायक बत्तख मियां अंसारी की दास्तां-

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पिरितिया के अदभुत खेल

मडई पर इन सभी बातों का कोई असर नहीं पडता. तब गांव वालों ने धमकी दी कि डोमिनिया से मिलल, ओकरा से बोलल बतियावल छोड द, ना तो गांव और जाति, दुनों से निकाल देबल जाई. मडई अपनी धुन में थे, यह धमकी भी बेअसर. जब कोई बहुत छेडे तो मडई बस इतना ही कहते- हमार बात क ेले के गांव काहे परेषान बा और जेकरा जे करेके बा, करे, अब हमार जीवनसंगीनी तो सुगमोनवा ही बनीे

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गावेला बलेस्सर अजमगढ़ के, जे बाटे मुंहफूंकना रे सजनी....

मैं आजमगढ़ का रहनेवाला सामान्य सा एक बिरहा गायक हूं. अपनी गायकी को लेकर कभी द्वंद्व में नहीं रहता, ना रहना चाहता हूं कि नवरात्रा आये तो जरा माई का भजन गाकर भी खुद को लोकप्रिय कर लूं, सावन का महीना आये तो जरा बम भोले के गीतों पर भी सुर लगा लूं और जब होली आये तो साया-चोली का बाजूबंद खोलने में लग जाउं. मैं वही गाता हूं, जो सच है. सच यही है कि लोक का मिजाज यथार्थ में जीता है, वह अपने जीवन की सच्चाई को, जीवन की मस्ती को, जीवन की आकांक्षा को लोकगीतों में तलाशता है.

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बिदेसिया के निहोरा बा

Bhojpuri Cinema

 

बिदेसिया राउर आपन मंच बा. एगो साझा प्रयास बा. मकसद बा लोकरंग, लोकजीवन से जुड़ल लोक इतिहास सामने आवे. जे समृद्ध परंपरा रहल बा, ओकर दस्तावेजीकरन होखे. आप सबसे आग्रह बा, अधिक से अधिक सामग्री जुटा के बिदेसिया के समृद्ध करींजा.
संपर्क करीं जा : niralabidesia@gmail.com

 

बिदेसिया बिसेस: भिखारी ठाकुर

भोजपुरी सिनेमा के 50 बरिस

चिठी-पतरी, आख्यान-व्याख्यान

नदिया के पार के 25 वर्ष

दामुल के 25 साल

25 Yrs of Damul

एगो ऐतिहासिक क्षण

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